Monday, July 24, 2017

पौराणिक आख्यानों की ओर


पौराणिक आख्यानों में कई ऐसे दृष्टांत मिल जाते हैं जो आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक लगते हैं.कहा जाता है कि प्राचीन भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी और साधारणतः इसमें परिवर्तन संभव नहीं था.लेकिन विश्वामित्र प्रतापी क्षत्रिय नरेश थे जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.जिस सविता देवी की स्तुति रूप गायत्री की दीक्षा उपनयन में दी जाती है उसके दृष्टा विश्वामित्र ही माने जाते हैं.

पुराणों के अनुसार विश्वामित्र कान्यकुब्ज देश के महीपति थे.एक बार वे सेना के साथ आखेट के लिए गए और शिकार करते हुए बहुत दूर निकल गए.भूख-प्यास से व्याकुल लौटते हुए एक जगह सुंदर आश्रम दिखा,पता चला यह महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है.सेना को वहीँ छोड़ वे ऋषि के दर्शन हेतु उनके आश्रम जा पहुंचे.वशिष्ठ से कुशल क्षेम पूछने के बाद चलने को तत्पर हुए तो वशिष्ठ ऋषि ने उनसे आतिथ्य ग्रहण का अनुरोध किया.

विश्वामित्र को यह गर्वोक्ति लगी तो उन्होंने कहा कि उनके साथ विशाल संख्या में सैनिक भी हैं.वशिष्ठ ऋषि ने निवदन किया,क्या हानि है,पास ही पवित्र जल वाली नदी है.कम से कम उससे ठंढा जल तो सबको मिल ही जाएगा.भोजन के लिए भी जो हो सकेगा वह प्रबंध हो जाएगा.’

विश्वामित्र ने वशिष्ठ की उस उक्ति को गर्वोक्ति माना और विचार किया कि आज उनका अभिमान तोड़ ही देना चाहिए.प्रकट में कहा कि ऋषि की आज्ञा शिरोधार्य है,मैं सेना सहित आपका आथित्य ग्रहण करूंगा.’वशिष्ठ के शिष्यों ने प्रत्येक के लिए इच्छानुसार भोजन सामग्री प्रस्तुत कर दी साथ ही घोड़ों के केलिए भी यथोचित सामग्री प्रस्तुत की गयी.सभी लोगों के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि इतना सुख तो अपने घरों में भी नहीं है.

भोजन आदि से निवृत्त होकर जब विश्वामित्र पुनः विदा मांगने वशिष्ठ के पास पहुंचे जब जिज्ञासा प्रकट की,’आश्रम तो छोटा प्रतीत होता है ,इतनी बड़ी सेना के लिए आथित्य का सामान कहाँ से आया.’वशिष्ठ ने अपनी गौ को ओर संकेत करते हुए कहा –‘भारतवर्ष का मुख्य धन तो यही गौ है.इस कामधेनु गौ की कृपा से ही यहाँ सब कुछ सुलभ है.’
विश्वामित्र ने कहा.’ऐसी अनुपम वस्तु का प्रयोग तो आप कभी-कभी ही कर पाते होगें,यह तो हमारे राजदरबार के उपयुक्त है.कृपया इसे हमें दे दीजिए.’वशिष्ठ ने कहा,’आप हमारे अतिथि हैं.अतिथि को उनकी इच्छानुसार सबकुछ दिया जा सकता है किंतु यदि यह गौ अपनी इच्छानुसार आपके साथ जाना चाहे तो इसे ले जा सकते हैं,इसके लिए बल प्रयोग नहीं होना चाहिए.’

महाराजा विश्वामित्र ने अपने सैनिकों को गौ ले चलने की आज्ञा दी किंतु गौ डकारते हुए वशिष्ठ के चरणों में बैठ गयी.वशिष्ठ ने कहा,’राजन, गौ जाना नहीं चाहती तो मैं बलात भिजने में असमर्थ हूँ.’इस पर विश्वामित्र आवेश में आ गए.उन्हों अपने सैनिकों को गौ को बांधकर ले जाने की आज्ञा दी लेकिन वशिष्ठ के तेज के कारण उनके समीप नहीं पहुँच सके.अंत में दिव्यास्त्रों का प्रहार शुरू कर दिया.

वशिष्ठ ने कोई उत्तर नहीं दिया केवल अपना ब्रह्मदंड लेकर खड़े हो गए.विश्वामित्र के दिव्यास्त्रों को ब्रह्मदंड निगल जाता था.यह देखकर विश्वामित्र ने अपना धनुष तोड़कर फेंक दिया उनके मुंह से निकल पड़ा.........

धिग् बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजो बलं वलम् |
एकेन ब्रह्मदण्डेण सर्वस्त्राणि हतानि में ||

विश्वामित्र ने निश्चय किया कि वे ब्रह्म्बल प्राप्त करेंगे.इस निश्चय के साथ ही वे ब्रह्म्बल की प्राप्ति के लिए तपस्या करने चले गए.उन्होंने ताप किया और ब्राह्मणत्व प्राप्त किया.एक क्षत्रिय के ब्राह्मणत्व प्राप्त करने पर भी वर्ण व्यवस्था पर कोई चोट नहीं पहुंची.यह वर्ण व्यवस्था के लचीलेपन का प्रमाण है.ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेने पर भी कौशिक गोत्र में बने रहने कि सम्भावना व्यक्त की जाती है.विश्वामित्र का कौशिक नाम वेदों और पुराणों में मिलता है.

Monday, July 17, 2017

मृत्यु का देवता


दुनियां के प्रायः सभी देशों,सभी सभ्यताओं में प्राचीन आख्यानों और मिथकों की समुद्ध परंपरा रही है.ये आख्यान और मिथक एक तरह से मनुष्य के आध्यात्मिक और भौतिक विकास का इतिहास भी हैं.वे उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत करते हैं,जिन्होंने मनुष्य की विचारधारा,उसके दृष्टिकोण,उसके जीवन को प्रभावित किया है.

कई देशों की लोककथाओं में मिथकों का व्यापक विस्तार और समानताएं भी देखने को मिल जाती हैं.भारतीय मिथकों और लोकगाथाओं में यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है.मिस्त्र की सभ्यता में ओसिरिस को मृत्यु का देवता माना जाता है.

प्राचीन मिस्त्र में यह विश्वास प्रचलित था कि मृत्यु के पश्चात प्रत्येक व्यक्ति को ओसिरिस के लोक में प्रवेश करना पड़ता  है,जहाँ उसके पाप-पुण्य का विचार किया जाता है.प्राचीन मिस्त्र की मूर्तिपूजक सभ्यता में भारत से कई गुणा अधिक देवी-देवताओं का आधिपत्य था.सूर्य देवता जिसे ‘रा’ कहा जाता था,मिस्त्र के देव-मण्डल का प्रमुख था.उसी ने स्वयं को बनाया था और उसके बाद सृष्टि की रचना की थी.

प्राचीन मिस्त्र के धार्मिक साहित्य में ‘रा’ की महिमा का वर्णन मिलता है लेकिन देवताओं में सर्वाधिक रोमांचक और विविध वर्णन ओसिरिस का है.ओसिरिस मृत्यु का देवता माना जाता था और मृत्यु के बाद जीवन की कल्पना जितनी गहराई से प्राचीन मिस्त्री आस्था और विश्वासों से जुड़ी हुई थी,उसे देखते हुए ओसिरिस को विशेष स्थान प्राप्त था.

ओसिरिस को लेकर एक रोचक मिथक प्राचीन मिस्त्र के धर्म लेखों में मिलता है.एक बार ‘रा’ को पता चला कि नुतृ और गेब नामक दो देवी-देवता एक दूसरे से प्यार करते हैं.’रा’ ने क्रोधित होकर ‘नुतृ’ को श्राप दिया कि वह वर्ष के किसी भी दिन संतान को जन्म नहीं दे सकेगी.

इस गंभीर समस्या का हल ‘थोत’ देवता ने निकाला.वह हर रोज थोड़ा-थोड़ा समय चुराकर रख लेता था.इस तरह चुराए हुए समय से उसने पांच दिनों का निर्माण किया.उन अतिरिक्त दिनों के दौरान नुतृ ने ओसिरिस,होरस,सेत,आइसिस और नेपथे को जन्म दिया.प्राचीन मिस्त्री लोग वर्ष के अंतिम पांच दिनों को इन्हीं नामों से जानते थे.नेपथे और सेत तथा ओसिरिस और आइसिस विवाह में बंध गए.

बाद में ओसिरिस मिस्त्र का राजा बन गया और देव समाज में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिल गया.सेत ओसिरिस से ईर्ष्या करता था.एक बार ओसिरिस मिस्त्र से बाहर दूसरे देश की यात्रा पर गया.लौटने पर सेत ने उसके सम्मान में दावत दी. उसने ओसिरिस की लम्बाई के अनुसार एक सुंदर और मजबूत ताबूत बनवाया.दावत शुरू हुई तभी सेत के संकेत पर दास उस ताबूत को उठाकर लाए.सेत ने मुस्कुराकर कहा-‘मित्रो ! आओ एक खेल खेलते हैं.मुझे यह विचित्र संदूक उपहार में मिला है.हम सब बारी-बारी से इस संदूक में लेट कर देखें.’

खेल शुरू हुआ.ओसिरिस के अतिरिक्त बारी-बारी से हर व्यक्ति उस ताबूत में घुसा,किसी ने ताबूत को छोटा तो किसी ने बड़ा बताया.अंत में ओसिरिस की बारी आई.वह ख़ुशी-ख़ुशी ताबूत में जा लेटा.पलक झपकते ही ताबूत को बंद करके उसमें पिघला हुआ शीशा लगा दिया गया.सेत के घर के पास ही एक नदी बहती थी जिसके गहरे पानी में उसे फेंक दिया गया.

आइसिस को पता चला कि सेत ने उसके साथ क्या कर डाला है.रोती-कलपती वह हर आने-जाने व्यक्ति से पूछती कि क्या उसने नदी में बहते किसी ताबूत को देखा है?आखिर में दो बच्चों ने उसे बताया कि उन्होंने कुछ लोगों को एक ताबूत नदी में फेंकते हुए देखा था.

नदी में गिरने के बाद ताबूत समुद्र में पहुंचा और बहता हुआ लेबनान में बिबलास नगर के तट पर जा लगा.लहरें ताबूत को किनारे पर छोड़ गयीं.ताबूत कुछ पौधों में अटक गया.बाद में वहां एक विशाल वृक्ष उग आया जिसके तने में ताबूत छिप गया.

एक दिन बिबलास के राजा ने पेड़ को देखा तो उसे काटने का आदेश दिया.काटने के बाद शिल्पियों ने पेड़ के तने को एक स्तम्भ का रूप दे दिया.काष्ठ स्तंभ राजप्रासाद के एक कक्ष में छत को सहारा देने के लिए लगा दिया गया.ताबूत में बंद ओसिरिस का शव अब उस स्तंभ की कैद में था.आइसिस अपनी दैवीय शक्ति के बल पर पूरी घटना को जान गयी.वह बिबलास जा पहुंची और रानी की दासियों से मित्रता कर ली.आइसिस के शरीर से विचित्र सुगंध निकलती थी.दासियों के शरीर में भी वही सुगंध बस गयी.

उस विचित्र सुगंध से रानी आकर्षित हुई,दासियों से पूछा और आइसिस को महल में बुला भेजा.आइसिस ने रानी को जैसे सम्मोहित कर दिया था.उसने आइसिस को महल में बच्चे की देखभाल के लिए रख लिया.रात हुई.कक्ष में आग जल रही थी.आइसिस ने सोचा वह बच्चे को अमर बना दे.उसने बच्चे को पवित्र करने के लिए आग में डाल दिया और चिड़िया बनकर उस काष्ठ स्तंभ के चक्कर लगाने लगी जिसके अंदर उसके पति का ताबूत था.

उसी समय रानी कमरे में आयी तो बच्चे को आग में पड़ा देखकर आतंक से चीख उठी.आइसिस ने बच्चे को आग से निकाल लिया,बच्चा सकुशल था.उसने रानी को अपना वास्तविक परिचय दिया,कहा,’मुझे अपने पति की देह चाहिए.’रानी आश्चर्य से अभिभूत खड़ी रही.आइसिस ने स्तंभ को काटकर ताबूत बाहर निकला और ताबूत लेकर चली आयी.बाद में बिबलास ने आइसिस के सम्मान में विशाल मंदिर का निर्माण करवाया.

आइसिस पति का ताबूत लेकर मिस्त्र की ओर चल दी.वहां पहुचकर उसने ताबूत को खोला और ओसिरिस के निष्प्राण शरीर से लिपटकर विलाप करने लगी.फिर ताबूत को झाड़ियों में छिपाकर महल जा पहुंची.इस बीच सेत को भी साड़ी घटना मालूम हो चुकी थी.वह मौका देखकर गया और झाड़ियों में छिपा ताबूत उठाकर चल दिया.उसने ओसिरिस के अनेक टुकड़े कर दिए और मिस्त्र में दूर-दूर तक फेंक दिया.

आइसिस महल से बहन नेपथे के साथ लौटी तो ताबूत को न पाकर खोजबीन शुरू कर दी.दोनों ने ढूंढ़कर ओसिरिस के शरीर के टुकड़े इकठ्ठे किए और हर जगह अंतिम संस्कार करके ओसिरिस का एक मंदिर बना दिया.इस तरह ओसिरिस एक सर्वपूज्य देवता बन गया,मृत्यु का देवता.

Monday, July 10, 2017

खो गए बुलबुल के तराने

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कहा जाता है कि चिड़िया तो मनुष्य के बिना रह सकती है लेकिन मनुष्य चिड़ियों के बिना सूना महसूस करता है.चीन में चिड़ियों की कमी वहां के पर्यटकों को अत्यधिक महसूस होती है.सुबह तथा शाम यदि चिड़ियों का झुण्ड दिखाई न दे एवं उनका कलरव सुनाई न पड़े तो सूनापन महसूस होता ही है.

चिड़ियों के रूप-रंग,सौन्दर्य,विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ,आकर्षक उड़ान एवं मधुर गान से आनंद की अनुभूति होती है.घरेलू कौआ,गोरैया,मैना तथा बुलबुल जैसी चिड़िया जो आम थी अब शायद ही यदा-कदा दिखाई देती है.गानेवाली तथा बोलनेवाली चिड़ियों में बुलबुल,मालावार विस्लिंग,थ्रश,श्यामा,पहाड़ी मैना तथा तोता आदि चिड़ियों की भाषा सरल ध्वनियों तथा मुद्राओं के रूप में होती है.

मानव जीवन  में चिड़ियों की उपयोगिता समय-समय पर सिद्ध होती रही है.कीड़ों-मकोड़ों कृषि के विनाशक कीटों के सफाये में जहाँ इनका अमूल्य योगदान है वहीँ पनडुब्बी(डाइवर) कुल के बहुत से पक्षी परागण को एक फूल से दूसरे फूल तक ले जाने में सहायक होते हैं.पुष्प-पक्षी तो केवल मधुरस पर ही जीवित रहते हैं.चंदन का बीज मुख्यतः बुलबुल तथा वार्वेट पक्षियों द्वारा फैलाया जाता है.

अनेक देवी-देवताओं के वाहन पक्षी हैं.पतंजलि के युग में कौवों से संबंधित विज्ञान- वायुविद्या बहुत लोकप्रिय थी.सुदूर आकाश में स्वर्ग की सीमा के भीतर तक उड़कर पहुँचने की उनकी योग्यता के कारण ऐसा कहा जाता है कि कौवे अज्ञात सत्य तथा भविष्य को भी जान सकते हैं.

आयुर्वेद में पक्षियों द्वारा मनुष्यों को स्वास्थ्य लाभ कराने तथा प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने हेतु आवश्यक माना गया है.वेदों,पुराणों,रामायण,महाभारत तथा संस्कृत के महाकाव्यों में विभिन्न पक्षियों का वर्णन मिलता है.अपने रंग-बिरंगे परों तथा पंखों,सुहावने रूप-रंग,विभिन्न प्रकार की उड़ानों और मधुर संगीत द्वारा पक्षियों ने कवियों का ध्यान आकर्षित किया है.

वर्षाकाल प्रारंभ होते ही मोर नाचने लगते हैं,तुलसीदास राम के मुख से कहवाते हैं.........

लछिमन देखहू मोरजन नाचत वारिद पेखि

वर्षाकाल के अंत होते ही खंजन पक्षी दिखने लगते हैं तुलसीदास ने इनका वर्णन किया है......

वर्षा विगत शरद ऋतु आई
लक्ष्मण देखहू परम सुहाई
जानि शरद ऋतु खंजन आए
पाई समय जिमि सुकृत सुहाए

कवि सुमित्रानंदन पंत ने पक्षियों के चहकने की नक़ल की है....

संध्या का झुट-पुट
वृक्षों का झुरमुट
चहक रही चिड़िया
ट्वी-टी-टुट- टुट

कवि निराला ने पक्षियों से प्रभावित होकर लिखा......

बड़े नयनों में स्वपन
खोल बहुरंगी पंख विहग से

यह विडंबना ही है कि विकास के पथ पर अग्रसर मानव समाज में अब पक्षियों के अस्तित्व पर चर्चा नहीं होती.कुछ पशु भले ही सामाजिक,राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गए हों लेकिन विकास का बाजारवाद पक्षियों के विलुप्त होते जाने पर चर्चा नहीं करता.हकीकत यही है कि भले ही हम उत्तरोतर आधुनिक होते जा रहे हैं,नयी तकनीक से गृहनिर्माण कर रहे हैं,कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं,हर दूसरे घरों की छतों पर मोबाईल के टावरों को बनने देते रहे हैं  लेकिन सामजिक जीवन में पक्षियों के अस्तित्व को भी नहीं नहीं नकारते.

किसी शायर ने वाजिब ही कहा है कि.........

आलम को लुभाती है पियानो की सदाएं
बुबुल के तरानों में अब लय नहीं आती 

Monday, July 3, 2017

यादें नई पुरानी

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मैथिली में एक कहावत है कि ‘एना कते दिन’ ,मतलब इस तरह कितने दिन.इस नाम से मैथिली में एक फिल्म भी बनी है. आलस्य में इस तरह कितने दिन बीत गए पता ही नहीं चला कि आखरी पोस्ट कब लिखी थी.एक तो व्यस्तता उस पर भी आलस्य हावी.इधर दो चार दिनों से ब्लॉग पर सक्रिय होने की काफी चर्चा चल पड़ी थी तो तय हुआ कुछ लिखना तो चाहिए ही.

इधर यू ट्यूब पर टहलते मेरे पसंदीदा अभिनेता शशि कपूर की कुछ वीडियो क्लिप दिखाई दी तो वही मासूम सा चेहरा आखों में तैर गया.’हसीना मान जाएगी’,प्यार का मौसम’,’कन्यादान’ सरीखी फिल्मों के अभिनेता का हालिया  तस्वीर तो काफी विचलित करने वाला था.

शायद यही वजह रहती होगी कि प्रमुख अभिनेता,अभिनेत्रियों में ढलते उम्र की तस्वीर मीडिया से बचाने की.फिर भी यदा कदा उनकी तस्वीरें सामने आती रहती हैं.कुछ महीने पूर्व दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना का अस्पताल से चित्र जारी हुआ था तो प्रशंसकों को गहरा धक्का लगा था.शायद इसी कारण से देव आनंद अपने अंतिम संस्कार विदेश में करवाना चाहते थे.

सभी अभिनेता,अभिनेत्री यह इच्छा रखते हैं कि वे ताउम्र जवां बने रहें ताकि प्रशंसकों में उनकी परदे वाली छवि बनी रहे और इस कारण इसी किस्म के रोल भी करते रहते हैं लेकिन मानव शरीर पर उम्र तो हावी रहती ही है. वे भूल जाते हैं कि मानव शरीर का दिन प्रतिदिन क्षरण होता रहता है.

प्रमुख अमेरिकन कवि हेनरी वड्सवर्थ लोंगफेलो कि एक कविता पढ़ी थी जिसमें कवि कहता है......

Dust thou art, to dust thou returnest
यह शरीर मिट्टी से बना है और मृत्यु के बाद मिट्टी में ही मिलना है.

सभी अभिनेता,अभिनेत्रियों के एक नहीं कई चेहरे होते हैं,पर्दे पर कुछ और तो वास्तविक जीवन में कुछ और.शायद व्यावसायिकता का तकाजा हो या दर्शकों में अपनी छवि बनाए रखने कि जुगत.इसी को दाग फिल्म में बड़ी खूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था...

जब भी चाहे नई दुनियां बसा लेते हैं लोग
एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग 


दूरदर्शन पर कई बरस पहले एक धारावाहिक इसी कंसेप्ट पर आया था ‘चेहरे पर चेहरा’ जिसमें बांग्ला के प्रसिद्ध अभिनेता अनिल चटर्जी प्रमुख भूमिका में थे.मानव जीवन की विसंगति ही है किहर जगह हमें अलग-अलग चेहरों की जरूरत पड़ती है.


Thursday, February 23, 2017

एक लेखक का जाना

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एक लेखक का ख़ामोशी से जाना और कोई खबर नहीं बनना साहित्यिक जगत के लिए कोई नया नहीं है.पहले भी ऐसा कई बार हुआ है.साहित्यिक जगत तो फिर भी उसे लेखक मानने को तैयार न था.साहित्यिक जगत ने ही मेरठ से एक बड़ी तादाद में छपने वाले लेखकों और उपन्यासकारों की लेखनी को लुगदी साहित्य से नवाजा था.कारण इस तरह के लेखकों का साहित्य बेकार और रद्दी के कागजों,जिसे लुगदी कहा जाता था,पर छापा जाता था.

इम्तिहान के बाद के खाली समयों को उन दिनों इसी लुगदी साहित्य ने भरा था.कर्नल रंजीत तो फिर भी पुराने हो चुके थे लेकिन वेद प्रकाश शर्मा उन दिनों लिखना शुरू कर रहे थे.पहली बार उनका उपन्यास ‘अल्फांसे की शादी’ पढ़ा था.फिर एक बार जो पढ़ने का चस्का लगा तो उनके कई उपन्यास पढ़ डाले.'कैदी न. 100',’दहेज़ में रिवाल्वर’,’वर्दी वाला गुंडा’ तो काफी चर्चित हुआ.उन दिनों वेद प्रकाश शर्मा के अलावा वेद प्रकाश कम्बोज,कर्नल रंजीत,सुरेन्द्र मोहन पाठक का भी जासूसी उपन्यास में बोलबाला था.

हस्य,रोमांच भरे जासूसी उपन्यासों में वेद प्रकाश शर्मा का कोई जवाब नहीं था.देशी,विदेशी किरदार,परत दर परत खुलते राज,पाठकों को बांधे रखते थे.उन दिनों ये उपन्यास दो-तीन रूपये के किराए पर भी मिल जाते थे.हममें से बहुत से पाठकों ने इसी तरह उनके उपन्यासों को पढ़ा था. वेद प्रकाश शर्मा ने तकरीबन 176 उपन्यास लिखे और कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट भी लिखी.

उस दौर के उपन्यासकारों में जासूसी के अलावा रूमानी लेखकों का भी जलवा था.रानू,गुलशन नंदा से लेकर अन्य कई लेखकों ने पाठकों के दिलों में जगह बनायी.

समय बदला और लोगों की रूचि भी बदली. लोग अब नफासत पसंद लेखकों की बिरादरी की किताबों को ढूँढ़ने लगे थे.अब नाम ही काफी होता था,चाहे किताबें कैसी भी हों.इसी क्रम में हम सबने भी कई देशी,विदेशी लेखकों को पढ़ा.चेतन भगत से लेकर पाउलो कोएलो तक को खूब पढ़ा.चेतन भगत अब उत्सुकता नहीं जगाते.उनका नवीनतम उपन्यास ‘वन इंडियन गर्ल’ पिछले दो महीने से ज्यों का त्यों रखा है लेकिन अभी तक पढ़ने की इच्छा नहीं हुई.आज के दौर के कई लेखक बेस्टसेलर भले ही हों लेकिन आम लोगों की नब्ज पकड़ने में माहिर नहीं लगते.

अब भले जासूसी उपन्यासों का क्रेज ख़त्म हो चुका हो लेकिन अपने देश में जासूसी उपन्यासों की एक लंबी परंपरा रही है.इब्ने शफी,बी.ए. से लेकर वेद प्रकाश शर्मा तक लेखकों की एक कतार रही है और इस विधा के माहिर रहे हैं.लेकिन बदलते समय के साथ पढ़ने को लेकर भी लोगों की रुचियाँ बदली हैं और लोग अब गंभीर किस्म के साहित्य को या ज्यादा नामी-गिरामी  लेखकों को पढ़ने में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं.

साहित्य भले ही बदल गया हो और अब गंभीर किस्म के साहित्य को ज्यादा तवज्जो मिलने लगा हो लेकिन पढ़ने के शुरूआती दौर के लोकप्रिय उपन्यासकार हमेशा हम जैसे पाठकों के जेहन में रहेंगे.

Tuesday, February 14, 2017

इन दोहन पर न जाइए

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हालांकि, हिंदी साहित्य की दृष्टि से दोहा एक छोटा सा मांत्रिक छंद है लेकिन कथ्य  का संक्षिप्त एवं स्पष्ट वर्णन करने के लिए  यह बड़ा सशक्त माध्यम है.चरणों का क्रम बदल जाने पर दोहा, सोरठा बन जाता है.

रहीम और वृंद ने नीति की बात संक्षेप में और आसानी से स्मरण रह जाने योग्य छंद में कहने के लिए दोहों को माध्यम बनाया तो मानस के रचयिता तुलसीदास ने चौपाई के बल पर दौड़ते हुए काव्य में थोड़ा-थोड़ा विश्राम देने की गरज से दोहों और सोरठों का सहारा लिया.

राजदरबारों में आशु कवि के रूप में चारणों या भाटों द्वारा कहे जाने वाले दोहे चमत्कारिक रहे हैं.कभी विलासी राजा को सचेत कर राजकाज की सुधि लेने कभी स्वाभिमानी  राजा को उसका स्वाभिमान कायम रखते हुए निर्णय लेने,कभी संधि के इच्छुक राजा को संधि के प्रस्ताव से मुकर जाने की प्रेरणा देते ये दोहे मानो धारा के प्रवाह को विपरीत दिशा में पलट देते नजर आते हैं.

जयपुर के राजा मानसिंह बड़े योद्धा थे.मुग़ल सम्राट के लिए इन्होंने काफी लड़ाइयों पर विजय पायी थी.किंतु एक बार जोश में उन्होंने लंका विजय का अभियान प्रारंभ करने का आदेश दे दिया था.यद्यपि सेनापतिगण इस अभियान की कठिनाईयों का आकलन कर इसमें असफलता की अधिक सम्भावना देख रहे थे,किंतु महाराज को प्रत्यक्ष में यह निवेदन कर कोई कायर नहीं कहलाना चाहता था.कूच कर जाने के नगाड़े बज चुके थे.महाराज स्वयं अश्वारूढ़ हो अभियान का नेतृत्व करने के लिए तैयार खड़े थे.इतने में चारण जी आए और घोड़े की लगाम पकड़ते हुए महाराज को यह सोरठा कह सुनाया.....

रघुपति दीनी दान,विप्र विभीषण जानि कै |
मान महीपति मान,दियो दान किमि लीजियै ||

(आप उन भगवान् राम के वंशज हैं ,जिन्होंने विभीषण को ब्राह्मण जानकर लंका दान में दे दी थी.हे राजा मान सिंह ! मान जाइए.क्या आप पूर्वजों द्वारा दिए गए दान को वापस लेना चाहते हैं?)

महाराज घोड़े से उतर पड़े और सेनापतियों ने संतोष की साँस ली.महाराज के स्वाभिमान को कायम रखते हुए उनके रघुवंश में जन्म लेने तथा दान की क्षत्रिय वंश की परंपरा की दुहाई ने अभियान की धारा बदल दी.

इन दिनों हल्दी घाटी का युद्ध फिर चर्चा में है.एक इतिहासकार ने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के विजयी होने और बादशाह अकबर के पराजित होने का दावा किया है.तथ्य जो भी हो, किंतु कहा जाता है कि एक दोहे ने महाराणा को अकबर से संधि करने से रोक दिया.

मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अकबर से टक्कर लेते-लेते महाराणा प्रताप जंगलों की ख़ाक छान रहे थे. भीलों द्वारा लाये गये घास के बीजों की रोटी खाकर परिवार गुजारा कर रहा था.पर एक दिन उनकी पुत्री के हाथ से जंगली बिलाव जब वह रोटी भी छीन ले गया तो महाराणा का ह्रदय द्रवित हो उठा और उन्होंने संधि का प्रस्ताव लेकर दूत को बादशाह अकबर के पास भेज दिया.

साहित्य प्रेमी अकबर के दरबार में अनेक कवि मौजूद थे.वे अकबर के दरबार में रहते अवश्य थे किंतु महाराणा द्वारा द्वारा मेवाड़ की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए किये जा रहे प्रयासों पर उन्हें हार्दिक गर्व था.चिठ्ठी देखकर सम्राट अकबर से उन्होंने कहा कि.”मैं महाराणा की हस्तलिपि जानता हूँ,इस प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर नहीं हैं,अतः इसकी पुष्टि कर लेना ठीक होगा.”अकबर के मन में यह शंका भरकर उन्होंने उसी दूत के हाथ यह सोरठा लिखकर महाराणा के पास भेज दिया........

पटकूं मूंछां पाण,कै पटकूं निज तन करद |
लिख दीजै दीवाण,इन दो मंहली बात इक ||

हे दीवान ! (मेवाड़ के महाराणा को राजा नहीं ,भगवान एकलिंग जी का दीवान कहा जाता है) मैं अपनी मूंछों पर ताव दूं ,या इस करदाता शरीर को नष्ट कर दूं? इन दो में से एक बात लिख दीजिए.”

यह चिठ्ठी पाते ही महाराणा की संधि-भावना तिरोहित हो गयी.इतिहास साक्षी है कि इसी के बाद भामाशाह के द्वारा प्रस्तुत धन और वफादार सैनिको के बल पर हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध लड़ा गया.  

Monday, January 30, 2017

ऐतिहासिक चरित्रों से निकलती चिंगारी

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इन दिनों मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत और रानी पद्मावती इतर कारणों से चर्चा में हैं.फिल्मों और धारावाहिकों में ऐतिहासिक चरित्रों या जनमन में बसे चरित्रों के साथ छेड़छाड़ या काल्पनिक प्रसंगों का जोड़ा जाना कोई नई बात नहीं है.काल्पनिक दृश्य फिल्मों एवं धारावाहिकों को जहाँ विवादों में लाकर प्रचार तो दिलाते ही हैं वहीं वे इसके निर्माताओं को भी मोटा मुनाफा दिलाने में भी कामयाब हो जाते हैं.

सन् 1304 में हुए चित्तौड़ के मर्मस्पर्शी जौहर से प्रेरित होकर कई कवियों और लेखकों ने कई कथाओं को जन्म दिया.इन सबमें सबसे अधिक लोकप्रिय जायसी द्वारा लिखित 1540 ई. का पद्मावत है.जायसी के बाद अन्य लेखकों ने भी पद्मावत को आधार बनाकर,तथ्यों को तोड़-मरोड़कर,कई नए ग्रंथ लिख डाले जिनमें हाजी उदबीर,फ़रिश्ता और कर्नल टॉड प्रमुख हैं जिन पर कई प्रश्न चिन्ह हैं? इन सबमें सबसे बड़ा प्रश्न यह रहा है कि चित्तौड़ के रावल रतन सिंह की महारानी का नाम पद्मिनी ही था या कोई और नाम था.

जायसी के पद्मावत में कुछ वृत्तांत भ्रामक प्रतीत होता है.जायसी द्वारा रतनसिंह के रावल बनने के बाद सिंहल द्वीप(श्रीलंका) जाने और बारह वर्ष तक रहने का उल्लेख है जबकि रतनसिंह कुल एक वर्ष ही राजगद्दी पर रहे.चित्तौड़ से प्राप्त सन् 1302 के शिलालेखों से यह पता चलता है कि सन् 1302 में रावल समरसिंह मेवाड़ के शासक थे.इस समय रतनसिंह राजगद्दी पर नहीं बैठे थे और सन् 1304 में अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुए युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुए थे.अलाउद्दीन के साथ आए अमीर खुसरो ने भी रतनसिंह की मृत्यु का वर्ष 1304 ही लिखा है.फिर कोई प्रश्न नहीं उठता है कि रतनसिंह पद्मिनी को प्राप्त करने के उद्देश्य से सिंहल द्वीप गया हो और वहां बारह वर्ष तक रहा हो.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित ‘जायसी ग्रंथावली’ में पद्मिनी को सिंहल द्वीप की राजकुमारी मानने से इंकार किया है.इसी तरह पद्मिनी और रावल के बीच जो प्रेम-प्रसंगों का वर्णन जायसी ने ‘पद्मावत’ में किया है वह काल्पनिक है.जायसी ने अपने ग्रंथ में कुम्भलनेर(कुम्भलगढ़) के शासक का नाम देवपाल बताया है,जबकि उस समय कुम्भलनेर आबाद ही नहीं हुआ था तो फिर उसके शासक का नाम देवपाल लिखना काल्पनिक प्रतीत होता है.

जायसी ने पद्मिनी का कांच में प्रतिबिंब दिखाने का जो प्रसंग लिखा है वह भी उपयुक्त प्रतीत नहीं होता है क्योंकि राजपूतों में किसी गैर पुरुष के सम्मुख लड़की या बहू को प्रस्तुत करने की परंपरा नहीं रही है,यहाँ तक कि चित्र दिखाने की भी परंपरा नहीं थी और आज भी कुछ घरानों में यह परंपरा नहीं है तो फिर रावल ने पद्मिनी का प्रतिबिंब दिखाना स्वीकार किया हो,यह असंभव सा प्रतीत होता है.

जायसी ने अलाउद्दीन द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण करने का कारण पद्मिनी को प्राप्त करना बताया है.उसके अनुसार राघव नमक भिक्षुक से पद्मिनी के सौंदर्य का वृत्तांत सुनकर अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण करने की योजना बनायी थी.जबकि ऐतिहासिक तथ्य है कि राजपूताने पर आक्रमण करने की उसकी सुनिश्चित योजना थी  जिसके अनुसार उसने न केवल चित्तौड़ पर बल्कि सिवाना,जालौर और रणथंभौर के प्रमुख दुर्गों पर भी आक्रमण किया था.

अमीर खुसरो जो आक्रमण के समय सुल्तान के साथ था और जिसने अपने ग्रंथ ‘तारीख-ए-इलाही’ में चित्तौड़ के आक्रमण और युद्ध का विस्तृत वर्णन किया है,कहीं भी युद्ध का कारण पद्मिनी को प्राप्त करने की योजना नहीं बताया है.इससे स्पष्ट होता है कि अलाउद्दीन के आक्रमण का कारण पद्मिनी नहीं बल्कि उसकी साम्राज्यवादी भावना थी जिसका परिचय उसने अन्य रियासतों में भी दिया था.

पद्मावत में कई काल्पनिक घटनाओं का समावेश है जिसके कारण यदि पद्मिनी भी उसकी एक काल्पनिक नायिका हो तो कोई आश्चर्य नहीं.समकालीन लेखक बर्नी,इसामी,इब्ने बतूता एवं अमीर खुसरो के ग्रंथ भी इसकी पुष्टि करते हैं.इन विद्वानों के ग्रंथों में मेवाड़ की महारानी का नाम पद्मिनी कही नहीं आया है.इन लोगों ने कहीं भी रावल रतनसिंह  और पद्मिनी के प्रेम-प्रसंग या अलाउद्दीन के पद्मिनी पर मोहित होने का जिक्र नहीं किया है.

राजपूत इतिहास के प्रमुख ग्रंथ वीर विनोद,नैणसी की ख्यात,वंश भाष्कर एवं उदयपुर राज्य का इतिहास भी रावल रतनसिंह के किसी महारानी पद्मिनी का उल्लेख नहीं करते.कुम्भलगढ़ एवं एकलिंग के शिलालेख अलाउद्दीन और रतनसिंह के युद्ध का वृत्तांत तो देते हैं लेकिन कहीं भी पद्मिनी के नाम का जिक्र नहीं है.अगर युद्ध का कारण पद्मिनी होती तो शिलालेखों में कही तो नाम आया होता.

जायसी की दृष्टि में यदि पद्मिनी ने इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी तो उसका नाम राजपूत एवं मुस्लिम स्त्रोतों में अवश्य ही होता.इस कारण इस धारणा को बल मिलता है पद्मिनी वास्तव में मेवाड़ की महारानी थी ही नहीं.संभव है पद्मिनी जायसी की काल्पनिक नायिका रही हो.

यह भी संभव है कि असंख्य नारियों के जौहर ने जायसी को लिखने के लिए प्रेरित किया हो और उस जौहर में उसने महारानी का नाम कही नहीं मिलने की दशा में पद्मिनी नाम से संबोधित किया हो क्योंकि सौंदर्य शास्त्रों के अनुसार पद्मिनी श्रेणी की नारियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं.

ऐतिहासिक स्रोतों से ऐसा प्रतीत होता है कि जौहर और युद्ध ने जायसी को एक सुंदर एवं रोचक महाकाव्य लिखने को प्रेरित किया और उसने अनेक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ,मनगढ़ंत घटनाओं एवं नामों को जन्म दिया.जौहर के दो सौ छत्तीस वर्ष बाद लिखे ग्रंथ में जायसी को मूल नाम एवं सत्य घटना का पता लगाने में अवश्य कठिनाई हुई होगी. 

रावल रतनसिंह की पटरानी के संबंध में केवल एक शिलालेख में ‘सुंभगादे’ नाम का उल्लेख मिलता है.जायसी के पद्मिनी का चरित्र भले ही काल्पनिक रहा हो जैसा कि वरिष्ठ इतिहासकार प्रो. इरफ़ान हबीब भी मानते है कि यह जायसी का काल्पनिक चरित्र है और इतिहास में इस नाम का कहीं जिक्र नहीं मिलता,फिर भी साहित्यिक दृष्टि से पद्मावत एक अनुपम काव्य है और साहित्य की धरोहर है.

ऐतिहासिक या लोकमन में बसे चरित्रों का चित्रण करते समय जनभावना का ख्याल रखा जाना जरूरी है.बेवजह इस तरह के चरित्रों को व्यावसायिकता की आड़ में, दर्शकों की रूचि के अनुसार ढालना या विवादों में घसीटना सही नहीं है.

Wednesday, January 11, 2017

अफ़साने और भी हैं

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आज के इस वैज्ञानिक युग में निरंतर रहस्यपूर्ण खोजें होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी.प्रतिदिन के समचार पत्र नित नयी खोजों और अध्ययनों से भरी रहती हैं.21वीं सदी में भी हम अपने आसपास नजर डालते हैं तो पाते हैं कि ऐसी कई चीजें हैं जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते और फिर उनकी जानकारी देने वाला साहित्य हमारे सामने आता है.यह भी विरोधाभास है कि जितनी जानकारी हमारी बढ़ती जाती है,उतना ही महसूस होता है कि हम कुछ नहीं जानते.

इस विरोधाभास का फायदा उठानेवालों की भी कमी नहीं है.जालसाजियाँ,धोखाधड़ियाँ इसलिए होती रहती हैं, क्योंकि हमें उसके बारे में कुछ पता नहीं होता.जालसाज हमारे अज्ञान को भुनाकर अपनी जेबें भरते हैं.लेकिन ताज्जुब तब होता है जब विशेषज्ञ माने जाने वाले लोग भी जालसाजी करने से बाज नहीं आते.

प्रत्येक वैज्ञानिक क्षेत्र के अनेक उपक्षेत्र भी बन गए हैं.हर क्षेत्र में विशेषज्ञता आ गयी है.हर क्षेत्र की अपनी भाषा है.एक तरफ जहाँ ज्ञान-विज्ञान में प्रगति हो रही है वहीं अंधविश्वास,रहस्यवाद तथा नीमहकीमी भी बढ़ रही है.इन बातों ने हर युग के वैज्ञानिकों को परेशान किया है.

वैज्ञानिक खुद भी लोगों को भ्रमित कर सकते हैं.इस बात का प्रमाण अनेक घटनाओं  से मिला है.चार्ल्स डॉसन इंग्लैंड के एक सम्मानित मानवशास्त्री खास तौर पर जीवाश्मशास्त्री थे.लोग उनकी उपलब्धियों के लिए उनकी कद्र करते थे.1932 में पिल्टडाउन के निकट  एक गड्ढे से उन्होंने एक खोपड़ी और निचले जबड़े के कुछ टुकड़े खोज निकाले. खोपड़ी काफी सख्त थी और मानवीय खोपड़ी जैसी ही लगती थी.जबड़ा भी मानव के आकार का था.जबड़ा, हालांकि आदिम था और खोपड़ी काफी विकसित.फिर भी दोनों चीजें एक दूसरे में सटीक बैठती थीं.

यह वह समय था जब वैज्ञानिक डार्विन के विचारों के ठोस साक्ष्य तलाशने में लगे हुए थे.उन्हें ऐसे ही किसी साक्ष्य का इंतजार था.प्रख्यात जीवाश्मशास्त्री तथा ब्रिटिश म्यूजियम के संग्राहक स्मिथ वुडवर्ड ने डॉसन के पिल्टडाउन मानव को ‘इयोएन्थ्रोपस डॉसोनी’ नाम दिया और उसका चित्रांकन भी किया.

डॉसन खुद वुडवर्ड को उस स्थल पर ले गए थे,जहाँ पिल्टडाउन मानव की खोज हुई थी.उनके बाद अन्य जीवाश्मशास्त्री भी उस स्थल को देखने गए.प्रख्यात जासूसी लेखक सर आर्थर कानन डायल ने भी उस स्थान का दौरा किया.उन दिनों वे अपनी पुस्तक “The Lost World” लिख रहे थे.

डॉसन ने पिल्टडाउन में एक अन्य स्थल की खोज भी कर डाली,जहाँ से उन्होंने तथा उनके साथियों ने अनेक नए साक्ष्य भी खोज निकाले.कुछ अनगढ़ किस्म के औजार,एक अन्य खोपड़ी के कुछ अंश अन्य जानवरों के अवशेष आदि.इन सभी खोजों से यह प्रमाण मिलता था कि इंग्लैंड में 10 और 20 लाख साल पहले मानव रह रहा था.

डार्विन विकासवादी थे.उन्होंने विकास को धीमी प्रक्रिया के रूप में चित्रित किया था. डॉसन की खोज ने मानो डार्विन के सिद्धांत को पुख्ता आधार प्रदान कर दिया था. डॉसन की खोज को लोगों ने ‘विलुप्त कड़ी’ के साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लिया.अगले 43 वर्षों तक किसी विद्वान ने इस पर अंगुली नहीं उठायी.

1955 में ब्रिटिश म्यूजियम ने इन जीवाश्मों से संबंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित की.फ्लोरीन की मात्रा के परीक्षण से पता चला कि खोपड़ी पचास हजार वर्ष से ज्यादा पुरानी नहीं है और जबड़ा तो आधुनिक ही है.रासायनिक परीक्षणों से यह पता चला कि जबड़े पर इस तरह के धब्बे लगा दिए गए थे कि वह प्राचीन जैसा नजर आए.

जबड़े के दांतों को रेती से रेता गया था.एक्सरे से यह भी पता चला कि उन दांतों की जड़ें किसी चिम्पांजी या ओरांग के दांतों की तरह लंबी हैं.यानी किसी चिम्पांजी या ओरांग के जबड़े को जानबूझकर इस तरह का रूप देने की कोशिश की गयी थी कि वानर और मानव के बीच का लगे.यह काम किसके द्वारा किया गया था इसका आज तक पता नहीं चला.हालांकि जे.एस. बीनर ने अपनी पुस्तक ‘द पिल्टडाउन फोर्जरी’ में यह संकेत दिया है कि यह जालसाजी खुद डॉसन द्वारा की गयी थी.

प्रख्यात अमेरिकी लेखक डैन ब्राउन का उपन्यास Deception Point भी इसी तरह की वैज्ञानिक धोखाधड़ी से संबंधितहै.उनका कथानक नासा की पृष्ठभूमि में है.अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव होने वाले हैं और नासा के लगातार विफल मिशन के कारण उसके बजट में भरी कटौती कर दी जाती है.निवर्तमान राष्ट्रपति नासा के समर्थक हैं जबकि चुनाव  में उनके प्रतिद्वंदी नासा के भारी-भरकम बजट के आलोचक  हैं और लोगों के सामने इसकी विफलताओं को पेश करते रहे हैं.

नासा के वैज्ञानिक नासा और निवर्तमान राष्टपति की गिरते साख को बचाने के लिए एंटार्कटिका में बर्फ के कई फीट नीचे एक रहस्मय चट्टान के मिलने का दावा करते हैं जो एक करोड़ वर्ष पुरानी और दूसरे ग्रह से आई प्रतीत होती है.नासा के वैज्ञानिकों की साख फिर से बढ़ जाती है और दुनियां भर के तमाम वैज्ञानिक इसकी जांच-पड़ताल में जुट जाते हैं.जांच में कई नए तथ्य मिलते हैं जो बताते हैं की यह चट्टान मानव निर्मित है और इसे प्रयोगशाला में बनाकर एंटार्कटिका में बर्फ में ड्रिल कर काफी नीचे दबा दिया गया था.

डैन ब्राउन के अन्य उपन्यासों की तरह ही इसमें भी रहस्य,रोमांच का ताना-बाना है जो यही बताते हैं की वैज्ञानिक बिरादरी में भी धोखाधड़ी और जालसाजी आम बात है.

Thursday, January 5, 2017

कुछ रंग इनके भी


फ़िल्मी गीत,संगीत से इतर कुछ गीत,नज्म क्या दिल के करीब हैं आपके? जाहिर है,हममें से बहुतों के होंगें.कई गीत,नज्म जो किसी फिल्म के हिस्सा नहीं बने लेकिन हम सब के दिलों के बहुत करीब हैं और जेहन में बसते हैं.

जानी बाबू और युसूफ आजाद काफी बड़े कव्वाली गायक रहे हैं.लेकिन जानी बाबू का एक नज्म जो बहुत चर्चित नहीं हो सका वह मेरे दिल के बहुत करीब है....

खिलौनों की बारात गुड़ियों की शादी
तेरा शहजादा मेरी शहजादी
तुझे याद हो या न हो लेकिन
मुझे याद आते हैं बचपन के वो दिन

मुझे मोहित चौहान तबसे पसंद रहे हैं जबसे 90 के दशक में उनके बैंड सिल्क रूट का एलबम बूँदें निकला था.
इसका एक गीत तो मुझे आज भी बहुत पसंद है.....

डूबा-डूबा रहता हूँ
आँखों में तेरी
दीवाना बन गया हूँ
चाहत में तेरी

उषा उथुप भी मेरी पसंदीदा गायिका रही हैं और कई बार उनका लाईव शो भी देखा है.जब वे स्टेज पर रहती हैं पूरी तरह छाई रहती हैं और दर्शकों,श्रोताओं से संवाद बनाने में माहिर हैं.एक गीत जो कुछ अन्य बांग्ला गायिकाओं ने भी सुरों से नवाजा है लेकिन उषा उथुप की आवाज में खूब फबते हैं.....

आहा तुमि सुंदरी कोता.....
कोलकाता

उषा उथुप का 80 के दशक में एक एलबम आया था जिसके गीत हालांकि ज्यादा चर्चित नहीं हुए लेकिन वे अपने स्टेज शो में अक्सर गाती रही हैं.....

आज मेरे घर आयेंगे साजन
छम छम नाचूंगी मैं
छोड़ो जी छोड़ो मेरा आंचल
बाली उमर है अभी मेरी
शरमा जाउंगी हाय मैं घबरा जाउंगी

चंदन दास काफी लोकप्रिय गजल गायक रहे हैं और उनकी गजलें मुझे भी बहुत पसंद हैं लेकिन 90 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक ‘फिर वही तलाश’ में बशीर बद्र के लिखे और चंदन दास की सुरों से सजे गजल आज भी मुझे चंदन दास के सबसे उम्दा गजल लगते हैं......

मेरे हमसफ़र मेरे साथ तुम 
सभी मौसमों में रहा करो  

फिर इसका टाइटिल गीत .......

कभी हादसों की डगर मिले
कभी मुश्किलों का सफ़र मिले
ये चिराग हैं मेरी राह के,
मुझे मंजिलों की तलाश है